शिव तांडव लिरिक्स और अर्थ – रावण रचित

इस ब्लॉग में शिव के महान भक्त रावण की एक कहानी सुना रहे हैं कि आखिर क्यों शिव ने उन्हें कैलाश के शिखर से नीचे गिरा दिया ।

रावण शिव का महान भक्त था, और उनके बारे में अनेक कहानियां प्रचलित हैं। एक भक्त को महान नहीं होना चाहिये लेकिन वह एक महान भक्त था। वह दक्षिण से इतनी लंबी दूरी तय कर के कैलाश आया- मैं चाहता हूँ कि आप बस कल्पना करें, इतनी लंबी दूरी चल के आना – और वो शिव की प्रशंसा में स्तुति गाने लगा। उसके पास एक ड्रम था, जिसकी ताल पर उसने तुरंत ही 1008 छंदों की रचना कर डाली, जिसे शिव तांडव स्तोत्र के नाम से जाना जाता है।

उसके संगीत को सुन कर शिव बहुत ही आनंदित व मोहित हो गये। रावण गाता जा रहा था, और गाने के साथ–साथ उसने दक्षिण की ओर से कैलाश पर चढ़ना शुरू कर दिया। जब रावण लगभग ऊपर तक आ गया, और शिव उसके संगीत में मंत्रमुग्ध थे, तो पार्वती ने देखा कि एक व्यक्ति ऊपर आ रहा था।

अब ऊपर, शिखर पर केवल दो लोगों के लिये ही जगह है। तो पार्वती ने शिव को उनके हर्षोन्माद से बाहर लाने की कोशिश की। वे बोलीं, “वो व्यक्ति बिल्कुल ऊपर ही आ गया है”।

अब ऊपर, शिखर पर केवल दो लोगों के लिये ही जगह है। तो पार्वती ने शिव को उनके हर्षोन्माद से बाहर लाने की कोशिश की। वे बोलीं, “वो व्यक्ति बिल्कुल ऊपर ही आ गया है”। लेकिन शिव अभी भी संगीत और काव्य की मस्ती में लीन थे। आखिरकार पार्वती उनको संगीत के रोमांच से बाहर लाने में सफल हुईं। और जब रावण शिखर तक पहुंच गया तो शिव ने उसे अपने पैर से धक्का मार कर नीचे गिरा दिया। रावण, कैलाश के दक्षिणी मुख से फिसलते हुए नीचे की ओर गिरा। ऐसा कहा जाता है कि उसका ड्रम उसके पीछे घिसट रहा था और जैसे-जैसे रावण नीचे जाता गया, उसका ड्रम पर्वत पर ऊपर से नीचे तक, एक लकीर खींचता हुआ गया।अगर आप कैलाश के दक्षिणी मुख को देखें तो आप बीच में से ऊपर से नीचे की तरफ आता एक निशान देख सकते हैं ।

कैलाश के एक मुख और दूसरे मुख के बीच में अंतर या भेदभाव करना ठीक नहीं है, लेकिन कैलाश का दक्षिण मुख हमें ज्यादा प्रिय है क्योंकि अगस्त्य मुनि कैलाश के दक्षिणी मुख में विलीन हो गये थे। तो ये शायद सिर्फ एक दक्षिण भारतीय पक्षपात है कि हमें कैलाश का दक्षिणी मुख ज्यादा पसंद है, और मुझे लगता है कि ये सबसे ज्यादा सुंदर है। ये सबसे ज्यादा श्वेत भी है क्योंकि वहां बहुत ज्यादा बर्फ है।

कई तरीकों से, इस मुख में सबसे ज्यादा तीव्रता है। लेकिन बहुत ही कम लोग हैं जो कैलाश के दक्षिणी मुख की ओर जा सकते हैं। ये बहुत ही दुर्गम है और वहां पहुंचना कम लोगों के लिये संभव है, क्योंकि इसका मार्ग अन्य मुखों की तुलना में बहुत ज्यादा कठिन है और कुछ ख़ास तरह के लोग ही वहां जा सकते हैं।

शिव तांडव स्तोत्र – Hindi Lyrics

जटा टवी गलज्जलप्रवाह पावितस्थले गलेऽव लम्ब्यलम्बितां भुजंगतुंग मालिकाम्‌।

डमड्डमड्डमड्डमन्निनाद वड्डमर्वयं चकारचण्डताण्डवं तनोतु नः शिव: शिवम्‌ ॥१॥

उनके बालों से बहने वाले जल से उनका कंठ पवित्र है,

और उनके गले में सांप है जो हार की तरह लटका है,

और डमरू से डमट् डमट् डमट् की ध्वनि निकल रही है,

भगवान शिव शुभ तांडव नृत्य कर रहे हैं, वे हम सबको संपन्नता प्रदान करें।

जटाकटा हसंभ्रम भ्रमन्निलिंपनिर्झरी विलोलवीचिवल्लरी विराजमानमूर्धनि।

धगद्धगद्धगज्ज्वल ल्ललाटपट्टपावके किशोरचंद्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम: ॥२॥

मेरी शिव में गहरी रुचि है,

जिनका सिर अलौकिक गंगा नदी की बहती लहरों की धाराओं से सुशोभित है,

जो उनकी बालों की उलझी जटाओं की गहराई में उमड़ रही हैं?

जिनके मस्तक की सतह पर चमकदार अग्नि प्रज्वलित है,

और जो अपने सिर पर अर्ध-चंद्र का आभूषण पहने हैं।

धराधरेंद्रनंदिनी विलासबन्धुबन्धुर स्फुरद्दिगंतसंतति प्रमोद मानमानसे।

कृपाकटाक्षधोरणी निरुद्धदुर्धरापदि क्वचिद्विगम्बरे मनोविनोदमेतु वस्तुनि ॥३॥

मेरा मन भगवान शिव में अपनी खुशी खोजे,

अद्भुत ब्रह्माण्ड के सारे प्राणी जिनके मन में मौजूद हैं,

जिनकी अर्धांगिनी पर्वतराज की पुत्री पार्वती हैं,

जो अपनी करुणा दृष्टि से असाधारण आपदा को नियंत्रित करते हैं, जो सर्वत्र व्याप्त है,

और जो दिव्य लोकों को अपनी पोशाक की तरह धारण करते हैं।

जटाभुजंगपिंगल स्फुरत्फणामणिप्रभा कदंबकुंकुमद्रव प्रलिप्तदिग्व धूमुखे।

मदांधसिंधु रस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरे मनोविनोदद्भुतं बिंभर्तुभूत भर्तरि ॥४॥

मुझे भगवान शिव में अनोखा सुख मिले, जो सारे जीवन के रक्षक हैं,

उनके रेंगते हुए सांप का फन लाल-भूरा है और मणि चमक रही है,

ये दिशाओं की देवियों के सुंदर चेहरों पर विभिन्न रंग बिखेर रहा है,

जो विशाल मदमस्त हाथी की खाल से बने जगमगाते दुशाले से ढंका है।

सहस्रलोचन प्रभृत्यशेषलेखशेखर प्रसूनधूलिधोरणी विधूसरां घ्रिपीठभूः।

भुजंगराजमालया निबद्धजाटजूटकः श्रियैचिरायजायतां चकोरबंधुशेखरः ॥५॥

भगवान शिव हमें संपन्नता दें,

जिनका मुकुट चंद्रमा है,

जिनके बाल लाल नाग के हार से बंधे हैं,

जिनका पायदान फूलों की धूल के बहने से गहरे रंग का हो गया है,

जो इंद्र, विष्णु और अन्य देवताओं के सिर से गिरती है।

ललाटचत्वरज्वल द्धनंजयस्फुलिंगभा निपीतपंच सायकंनम न्निलिंपनायकम्‌।

सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं महाकपालिसंपदे शिरोजटालमस्तुनः ॥६॥

शिव के बालों की उलझी जटाओं से हम सिद्धि की दौलत प्राप्त करें,

जिन्होंने कामदेव को अपने मस्तक पर जलने वाली अग्नि की चिनगारी से नष्ट किया था,

जो सारे देवलोकों के स्वामियों द्वारा आदरणीय हैं,

जो अर्ध-चंद्र से सुशोभित हैं।

करालभालपट्टिका धगद्धगद्धगज्ज्वल द्धनंजया धरीकृतप्रचंड पंचसायके।

धराधरेंद्रनंदिनी कुचाग्रचित्रपत्र कप्रकल्पनैकशिल्पिनी त्रिलोचनेरतिर्मम ॥७॥

मेरी रुचि भगवान शिव में है, जिनके तीन नेत्र हैं,

जिन्होंने शक्तिशाली कामदेव को अग्नि को अर्पित कर दिया,

उनके भीषण मस्तक की सतह डगद् डगद्… की घ्वनि से जलती है,

वे ही एकमात्र कलाकार है जो पर्वतराज की पुत्री पार्वती के स्तन की नोक पर,

सजावटी रेखाएं खींचने में निपुण हैं।

नवीनमेघमंडली निरुद्धदुर्धरस्फुर त्कुहुनिशीथनीतमः प्रबद्धबद्धकन्धरः।

निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिंधुरः कलानिधानबंधुरः श्रियं जगंद्धुरंधरः ॥८॥

भगवान शिव हमें संपन्नता दें,

वे ही पूरे संसार का भार उठाते हैं,

जिनकी शोभा चंद्रमा है,

जिनके पास अलौकिक गंगा नदी है,

जिनकी गर्दन गला बादलों की पर्तों से ढंकी अमावस्या की अर्धरात्रि की तरह काली है।

प्रफुल्लनीलपंकज प्रपंचकालिमप्रभा विडंबि कंठकंध रारुचि प्रबंधकंधरम्‌।

स्मरच्छिदं पुरच्छिंद भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छिदांधकच्छिदं तमंतकच्छिदं भजे ॥९॥

मैं भगवान शिव की प्रार्थना करता हूं, जिनका कंठ मंदिरों की चमक से बंधा है,

पूरे खिले नीले कमल के फूलों की गरिमा से लटकता हुआ,

जो ब्रह्माण्ड की कालिमा सा दिखता है।

जो कामदेव को मारने वाले हैं, जिन्होंने त्रिपुर का अंत किया,

जिन्होंने सांसारिक जीवन के बंधनों को नष्ट किया, जिन्होंने बलि का अंत किया,

जिन्होंने अंधक दैत्य का विनाश किया, जो हाथियों को मारने वाले हैं,

और जिन्होंने मृत्यु के देवता यम को पराजित किया।

अखर्वसर्वमंगला कलाकदम्बमंजरी रसप्रवाह माधुरी विजृंभणा मधुव्रतम्‌।

स्मरांतकं पुरातकं भावंतकं मखांतकं गजांतकांधकांतकं तमंतकांतकं भजे ॥१०॥

मैं भगवान शिव की प्रार्थना करता हूं, जिनके चारों ओर मधुमक्खियां उड़ती रहती हैं

शुभ कदंब के फूलों के सुंदर गुच्छे से आने वाली शहद की मधुर सुगंध के कारण,

जो कामदेव को मारने वाले हैं, जिन्होंने त्रिपुर का अंत किया,

जिन्होंने सांसारिक जीवन के बंधनों को नष्ट किया, जिन्होंने बलि का अंत किया,

जिन्होंने अंधक दैत्य का विनाश किया, जो हाथियों को मारने वाले हैं,

और जिन्होंने मृत्यु के देवता यम को पराजित किया।

जयत्वदभ्रविभ्रम भ्रमद्भुजंगमस्फुरद्ध गद्धगद्विनिर्गमत्कराल भाल हव्यवाट्।

धिमिद्धिमिद्धि मिध्वनन्मृदंग तुंगमंगलध्वनिक्रमप्रवर्तित: प्रचण्ड ताण्डवः शिवः ॥११॥

शिव, जिनका तांडव नृत्य नगाड़े की ढिमिड ढिमिड

तेज आवाज श्रंखला के साथ लय में है,

जिनके महान मस्तक पर अग्नि है, वो अग्नि फैल रही है नाग की सांस के कारण,

गरिमामय आकाश में गोल-गोल घूमती हुई।

दृषद्विचित्रतल्पयो र्भुजंगमौक्तिकमस्र जोर्गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः।

तृणारविंदचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे ॥१२॥

मैं भगवान सदाशिव की पूजा कब कर सकूंगा, शाश्वत शुभ देवता,

जो रखते हैं सम्राटों और लोगों के प्रति समभाव दृष्टि,

घास के तिनके और कमल के प्रति, मित्रों और शत्रुओं के प्रति,

सर्वाधिक मूल्यवान रत्न और धूल के ढेर के प्रति,

सांप और हार के प्रति और विश्व में विभिन्न रूपों के प्रति?

कदा निलिंपनिर्झरी निकुंजकोटरे वसन्‌ विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमंजलिं वहन्‌।

विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः शिवेति मंत्रमुच्चरन्‌ कदा सुखी भवाम्यहम्‌ ॥१३॥

मैं कब प्रसन्न हो सकता हूं, अलौकिक नदी गंगा के निकट गुफा में रहते हुए,

अपने हाथों को हर समय बांधकर अपने सिर पर रखे हुए,

अपने दूषित विचारों को धोकर दूर करके, शिव मंत्र को बोलते हुए,

महान मस्तक और जीवंत नेत्रों वाले भगवान को समर्पित?

इमं हि नित्यमेव मुक्तमुक्तमोत्तम स्तवं पठन्स्मरन्‌ ब्रुवन्नरो विशुद्धमेति संततम्‌।

हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथागतिं विमोहनं हि देहिनां सुशंकरस्य चिंतनम् ॥१६॥

इस स्तोत्र को, जो भी पढ़ता है, याद करता है और सुनाता है,

वह सदैव के लिए पवित्र हो जाता है और महान गुरु शिव की भक्ति पाता है।

इस भक्ति के लिए कोई दूसरा मार्ग या उपाय नहीं है।

बस शिव का विचार ही भ्रम को दूर कर देता है।

HAR HAR MAHADEV

विज्ञान और अध्यात्म में संबंध

वैज्ञानिक आध्यात्मवाद को समझने के लिए हमें इस तथ्य पर ध्यान देना होगा कि हमारे समक्ष जो विश्व ब्रह्माण्ड है, वह मूलतः दो सत्ताओं से मिलकर बना है- एक जड़ व दूसरा चेतन। जड़ सत्ता अर्थात् पदार्थ का अध्ययन विज्ञान का विषय है जबकि चेतन सत्ता (आत्मा-परमात्माश् का अध्ययन अध्यात्म का विषय है। अतः इस ब्रह्माण्ड को पूरे तौर से समझने के लिए हमें इन दोनों ही सत्ताओं को ध्यान में रखना होगा।

भारतवर्ष में अध्यात्म और विज्ञान का सदा से समन्वय रहा है। वेद एवं वैदिक वाग्म्य विज्ञान और अध्यात्म को साथ-साथ लेकर चलते हैं, फिर चाहे आयुर्वेद हो अथवा वास्तु। पश्चिमी देशों में भी एक लम्बे अर्से तक विज्ञान एवं अध्यात्म साथ-साथ रहे। प्रत्येक वैज्ञानिक ग्रन्थ में परमात्मा की चर्चा पाई जाती थी। सर आइजेक न्यूटन ने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘प्रिन्सपिया’ में परमात्मा की चर्चा करते हुए लिखा है कि परमात्मा ने इस ब्रह्माण्ड की रचना की और इसे एक संवेग प्रदान किया, जिसके कारण वह गतिशील है। उन्होंने यह भी लिखा कि ब्रह्माण्डरूपी नाटक के मंच पर जब कोई विकृति पैदा होती है, तो परमात्मा स्वयं उसे ठीक करता है। यह भाव कुछ इसी तरह का है जैसा की गीता में कहा गया है-

‘‘यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।

अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।।

परित्रणाय साधुनां विनाशाय च दुष्कृताम्।

धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे।।’

अध्यात्म और धर्म के बीच संबंधों की उपेक्षा का पहला उदाहरण प्रफांस में मिलता है जब वहां के प्रख्यात गणितज्ञ पियरे साइमन डी लाप्लास जो की सम्राट नेपोलियन के एक वैज्ञानिक सलाहकार थे, ने एक ग्रंथ लिखा जिसका नाम था, ‘सेलेशियल मिकैनिक्स्’। न्यूटन के नियमों का हवाला देते हुए, इस ग्रन्थ में उन्होने लिखा कि भविष्य कीे घटनाओं को हम उतनी ही परिशुद्धता से जान सकते हैं, जितनी परिशुद्धता से हम भूतकाल की घटनाओं को जानते हैं। उन्होंने लिखा कि यदि कोई व्यक्ति ब्रह्माण्ड के सभी कणो की स्थिति और वेग को जान सके, तो उसके लिये कुछ भी अनिश्चित नहीं रह जायेगा और उसकी आंखों के सामने भविष्य उसी तरह उपस्थित हो जायेगा जैसा कि भूतकाल। उन्होंने नेपोलियन को इस ग्रन्थ की एक प्रति भेट की, जिसे पढ़ने के बाद सम्राट ने लाप्लास से कहा कि आपने आकाशीय पिण्डों पर इतना विशाल ग्रन्थ लिखा है किन्तु इसमें एक बार भी परमात्मा की चर्चा नहीं की है। लाप्लास का उत्तर था, ‘श्रीमन् मुझे इस परिकल्पना की कोई आवश्यकता महसूस नहीं हुई।’

विज्ञान और अध्यात्म दोनों के लिए यह एक ऐसी घटना थी, जिसने उनके बीच एक दीवार खड़ी कर दी। जहां एक ओर इससे पूर्व दोनों एक दूसरे के पूरक के रूप में कार्य कर रहे थे, अब एक दूसरे के प्रतिद्वन्द्वी हो गए। यद्यपि दोनों ही मानवता के हित में कार्यरत थे, किन्तु एक दूसरे पर प्रहार करने लगे। परिणाम यह हुआ कि विज्ञान पर अध्यात्म का अंकुश नहीं रहा और वह स्वत्रंात रूप से इस प्रकार कार्य करने लगा कि नैतिक मूल्यों के प्रति उदासीन हो गया। दूसरी ओर विज्ञान से पृथक होने पर अध्यात्म अवैज्ञानिक मार्ग पर चल पड़ा और उसमें रूढ़िवादिता एवं अंधविश्वास का बाहुल्य हो गया। स्वाभाविक है कि समाज पर इसका कुप्रभाव पड़ा। आध्यात्मिक लोग विज्ञान के उपकरणो- जैसे लाउडस्पीकर, मोटर कार, रेलगाड़ी, वायुयान आदि का उपयोग तो करते थे किन्तु विज्ञान को जी भरकर कोसते थे। उनका उद्घोष था कि समाज के पतन के लिए विज्ञान ही उत्तरदायी है। दूसरी ओर वैज्ञानिक जगत के लोगों ने अध्यात्म को पांेगा पन्थी एवं ढांेग करार देना प्रारम्भ कर दिया। यह अत्यन्त ही दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति थी। दोनों ही सत्य के अन्वेषी होते हुए भी एक दूसरे पर कीचड़ उछालने लगे और इस द्वन्द्व की चरम परिणति उस समय हुई, जब दूसरे विश्व युद्ध की समाप्ति के क्षणो में जापान के दो नगर, हिरोशिमा और नागासाकी पर अमेरिका ने परमाणु बम गिराए। इसकी विभीषिका से सभी परिचित हैं। आज तक भी पीढ़ी दर पीढ़ी पर इन बमों के विस्फोट से उत्पन्न रेडियो धर्मिता विद्यमान है और मानव, जीव-जन्तु एवं वनस्पतियां उसके दुष्प्रभाव का शिकार बनी हुई हैं। सम्पूर्ण विश्व में इस घटना के कारण एक बहस छिड़ गई कि अन्तरात्मा के बिना विज्ञान सभी राष्ट्रों का सर्वनाश कर देगा। स्कूल, कालेज और प्रतियोगी परीक्षाओं में भी इस विषय पर निबन्ध लिखे जाने लगे। आइन्सटाइन बहुत ही गम्भीर हो गए थे और उन्होंने कहा कि ‘धर्म के बिना विज्ञान अन्धा है और विज्ञान के बिना धर्म लगड़ा।’

इसे मानवता का सौभाग्य ही कहेंगे कि विनोभा भावे जैसे सन्त ने विज्ञान एवं अध्यात्म के संगम तथा सहयोग की ओर मानवता का ध्यान आकृष्ट किया। इसी के साथ बीसवीं सदी में एक ऐसे महामानव का जन्म हुआ जो भारत के स्वतंत्रता संग्राम में जान की बाजी लगाते हुए, अन्ततोगत्वा आध्यात्मिक जगत की ओर उन्मुख हुए और उन्होंने विज्ञान और अध्यात्म का समन्वय करते हुए, एक नई विधा को जन्म दिया, जिसका नाम है ‘वैज्ञानिक आध्यात्मवाद’। यह महामानव थे, युग ट्टषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जिन्होंने गायत्री और यज्ञ को जन-जन तक पहुंचाने का कार्य किया। इसके अतिरिक्त शान्तिकुंज, ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान जैसी वैज्ञानिक अनुसंधान प्रयोगशाला के निर्माण के साथ-साथ ‘युग निर्माण योजना’ जैसे महत्त्वाकांक्षी आन्दोलन को जन्म दिया। इसके लिए उन्होंने ‘अखण्ड ज्योति’ जैसी अध्यात्म परक मासिक पत्रिका को सन् 1936 से प्रारम्भ किया, जो आजतक अनवरत रूप से साधकों का मार्गदर्शन कर रही है।

12 सितम्बर सन् 1946 ई. को उनके जीवन में अति महत्वपूर्ण घटना घटी। ब्रह्ममुहूर्त का समय था, जो कि उनके लिए सदा विशिष्ट रहा था। युग ट्टषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य की चेतना-चिन्तन में निमज्जित थी। पर यह दिन कुछ विशेष था। हिमालय की ट्टषि सत्ताओं एवं सद्गुरूदेव स्वामी सर्वेश्वरानन्द की सूक्ष्म अनुभूतियों की शृंखला के साथ उनके चिदाकाश में दो शब्द- ‘वैज्ञानिक अध्यात्म’ महामंत्र की तरह ध्वनित हुए। यह वैज्ञानिक अध्यात्म के महामंत्र का प्रथम साक्षात्कार था। ऐसा साक्षात्कार कराने वाली दिव्य अनुभूतियों के बाद हमेशा ही उनके अंतर्जगत एवं बाह्य जगत में घटनाओं का एक क्रम चल पड़ता था।

उन दिनों डा. हजारी प्रसाद द्विवेदी शान्तिनिकेतन में हिन्दी प्राध्यापक के रूप मे कार्यरत थे। उन्हें अखण्ड ज्योति पत्रिका एक परिजन ने भेंट की। अखण्ड ज्योति के उद्देश्य, लेखनशैली की नवीनता तथा प्रस्तुतीकरण ने, उन्हें बहुत प्रभावित किया। द्विवेदी जी ने पं. श्रीराम शर्मा आचार्य को शान्तिनिकेतन में पधारने का आमंत्रण दिया। जब वे शान्तिनिकेतन पहुंचे, तो संयोगवश उसी दिन वहां भारत के प्रख्यात् वैज्ञानिक एवं नोबेल फरस्कार विजेता प्रो. सी.वी. रमन का व्याख्यान आयोजित किया गया था। द्विवेदी जी के साथ आचार्यश्री भी प्रो. सी.वी. रमन का व्याख्यान सुनने के लिए व्याख्यान कक्ष में पहुंचे। प्रो. रमन ने अपने उद्बोधन में कहा, ‘‘बीसवीं सदी विज्ञान की सदी बन चुकी है। कोई देश इसके चमत्कारों के प्रभाव से अछूता नहीं है। जो आज हैं, वे कल नहीं रहेंगे। परन्तु विज्ञान का प्रयोग मानव हित में हो, यह चुनौती न केवल समूचे विज्ञान के सामने, बल्कि समूची मानवता के सामने है। वैज्ञानिकता, विज्ञान एवं वैज्ञानिकों को हृदयहीन व संवेदनहीन नहीं होना चाहिए। वे हृदयवान हों, संवेदनशील हों, इसके लिए उन्हें अध्यात्म का सहचर्य चाहिए।’’ प्रो. सी.वी. रमन का प्रत्येक शब्द मर्मस्पर्शी था। आचार्यश्री ने प्रो. रमन का उनके उत्तम व्याख्यान के लिए आभार व्यक्त किया। प्रो. रमन ने कहा, ‘‘बात आभार की नहीं, बात क्रियान्वयन की है।’’ इस पर आचार्यश्री बोले, ‘‘क्रियान्वयन तो अध्यात्म-क्षेत्र में भी होना है। उसे भी विज्ञान का सहचर्य चाहिए। विज्ञान के प्रयोग ही उसे मूढ़ताओं, भ्रांतियों एवं अंधपरम्पराओं से मुक्त करेंगे।’’ इस बात का वहां उपस्थित सभी ने समवेत समर्थन किया। तब प्रो. रमन ने कहा, ‘‘बीसवीं सदी भले ही विज्ञान की सदी हो पर इक्कीसवीं सदी वैज्ञानिक आध्यात्मवाद की सदी होगी।’’ ‘वैज्ञानिक अध्यात्म’ इसी का साक्षात्कार तो तरुण तपोनिष्ठ आचार्यश्री ने अपने समाधि-शिखरों पर किया था। उस दिन इस पर सभी मनीषियों की व्यापक परिचर्चा हुई और वहां से वापस आने पर वैज्ञानिक अध्यात्म के मंत्रदृष्टा आचार्यश्री ने जनवरी, सन् 1947 में वैज्ञानिक अध्यात्म पर एक विशेषांक प्रकाशित किया, जिसके प्रथम पृष्ठ की अंतिम पंक्ति में उन्होंने लिखा था, ‘‘अखण्ड ज्योति के पाठकों! स्मरण रखो, सबसे पहले जिसे पढ़ने और हृदयंगम करने की आवश्यकता है, वह वैज्ञानिक आध्यात्मवाद ही है। यही ट्टषियों का विज्ञान है।’’

वैज्ञानिक आध्यात्मवाद को समझने के लिए हमें इस तथ्य पर ध्यान देना होगा कि हमारे समक्ष जो विश्व ब्रह्माण्ड है, वह मूलतः दो सत्ताओं से मिलकर बना है- एक जड़ व दूसरा चेतन। जड़ सत्ता अर्थात् पदार्थ का अध्ययन विज्ञान का विषय है जबकि चेतन सत्ता (आत्मा-परमात्माश् का अध्ययन अध्यात्म का विषय है। अतः इस ब्रह्माण्ड को पूरे तौर से समझने के लिए हमें इन दोनों ही सत्ताओं को ध्यान में रखना होगा। सामान्यतः किसी भी विषय का अध्ययन न तो केवल भौतिक है और न ही केवल आध्यात्मिक। सत्य की खोज के लिए हमें, विज्ञान एवं अध्यात्म दोनों पर विचार करना होगा और यही वैज्ञानिक आध्यात्मवाद का मूल है

Gayatri mantra lyrics and meaning

Gayatri Mantra is a Hymn from the ancient Indian scripture RigVeda (10:16:3), also often repeated in other scriptures like Upanishads, It is attributed to sage Vishwa mitra. It is called Gayatri Mantra or Savitri Mantra because it is directed towards goddess Gayatri, who is not considered a deity or demigod, but the single supreme personality.

Gayatri is recited by a spiritual aspirant to remember the higher purpose of life, it can also be a invocation or prayer to the supreme god to lift our consciousness upwards.

It is usually recited by the people who consider ‘knowing the ultimate truth’ as the primary purpose of their life.

Lyrics (English)

Meaning (summary)

Oṃ bhūr bhuvaḥ svaḥ

tát savitúr váreṇyaṃ

bhárgo devásya dhīmahi

dhíyo yó naḥ pracodáyāt

(O) Supreme one; (who is) the physical, astral (and) causal worlds (himself).

(you are) the source of all, deserving all worship

(O) radiant, divine one; (we) meditate (upon you)

Propel our Intellect (towards liberation or freedom)

Stanzas with meaning

Meanings of the words

Om, Bhur, Bhuvah, Svah

[Ultimate reality, in which physical, astral and causal worlds exist]

Om: The sacred word, word of creation, first word, word of god; (Equivalent of Holy Ghost in trinity) usually used at the beginning of a hymn;

Bhur: The physical plane of existence (which is of the nature of 5 elements)

Bhuvah: The astral plane of existence (which is of the nature of subtle elements)

Svah: The causal plane or celestial plane (plane where the existence is as subtle as ideas or notions, from which creation happens).

Tát savitúr váreṇyaṃ

[That is the supreme reality from which creation happens, and it is the foremost]

Tat: That, God, (Equivalent of son, in the Christian Trinity of Father, Son and Holy Ghost)

Savitúr : Source of all, creation, supreme reality, Divine illumination (of goddess Savitri or Shakti)

Váreṇyaṃ: the foremost, fit to be worshiped, deserving oblations

Bhárgo devásya dhīmahi

[O divine effulgence we meditate upon you]

Bhárgo: Great spiritual effulgence, Radiant one, one who illumines all

Devásya: Godly, divine reality, of divinity, Virtuous and joyous

Dhīmahi: We meditate on you; Dhee=intellect; Thus Dhimahi means we focus our intellect on you

Dhíyo yó naḥ pracodáyāt

[propel our knowledge of the supreme reality]

Dhíyo: Intellect, intelligence, reasoning and discriminating faculty which is a tool for attaining higher wisdom

Yo: Who, One is who being prayed, You (supreme one)

Nah: Our (intellect)

pracodáyāt: Stimulate, Propel towards the higher reality

आत्मिक बल बढ़ाओ, बनावटी जिन्दगी छोड़ो

अपने स्वभाव को शांत बनाइए और अपने आपको सरल बनाइए। छल-कपट से अपने आपको बचाइए। ‘मनु’ के अनुसार आदमी जितना बनावटी होगा, दिखावा करेगा उतना ही वह अशांत होगा। व्यक्ति सरल बने, मन को संतोष दे, ऐसे व्यक्ति का नाम है ‘सौम्य’।

सोम म का अर्थ चन्द्रमा भी है। चन्द्रमा में 16 कलायें हैं।

व्यास के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण के 4 गुण थे जिन्हें हमें अपनाने चाहिएµ

1- पहली कला है प्रसन्नताभक्ति के मार्गपर चलना चाहते हो तो प्रसन्नता को चेहरे पर से जाने मत दो। श्रीकृष्ण विपत्तियां देखने के बाद मुस्कुराते थे। विपत्तियां आएं तो घबराओ नहीं, मुस्कुराओ, हिम्मत जुटाओ। हिम्मत आएगी तो विपत्तियां टल जाएंगी। दुःख के बादल जब घिरते हैं उस समय किसी अपने को आते देखकर रोना आ जाता है।

यही हाल द्रौपदी का हुआ था जब श्रीकृष्ण उनके सामने आए। श्रीकृष्ण ने उन्हें कहा था, द्रौपदी जो बीत गया उसको सोच-सोचकर अपनी हिम्मत ना हारो, भविष्य को सोच-सोचकर मत डरो और वर्तमान में हिम्मत जुटाओ। द्रौपदी बोली, ‘आपने दुःख नहीं देखा, आप मेरा दुःख कैसे समझोगे।’ श्रीकृष्ण का इस पर कहना था कि जिसका जन्म ही जेल में हुआ हो उसने क्या कम दुःख देखा है दुःख सामने आया है दुःख को दुःख समझा नहीं है।

2- मुसीबत जब आए तो माथे को गर्म नहीं होने देनाµअर्थात् दिमाग को संतुलित नहीं करेंगे तो बुद्धि चकराने लग जाती है और फेल हो जाती है।

3- मुसीबत के समय वाणी को कठोर नहीं होने देना चाहिए।

4- मुसीबत से हाथ-पांव में जोश बढ़ जाना चाहिए। सुख बहुत भोगा है, दुःख में संघर्ष करना है इसीलिए तैयार हो जाओ।

जो भी कुछ तुम पाना चाहते हो उसकेा बांटना सीखो। अगर जिन्दगी में बुरा करते रहे और साथ-साथ अच्छा दान भी करते रहे तो फल दोनों का भोगोगे। अगर हम खुद पाप कर रहे हैं और चाहते हैं कि पुण्य का फल भोगें तो यह सम्भव नहीं है।

एक चोर ने किसी की घोड़ी चुरा ली और अपने गांव लौट गया। गांव वालों के पूछने पर बोला कि इसे खरीदकर लाया हूं। एक दिन मेले में वह घोड़ी बेचने गया। सुबह से शाम तक कोई ग्राहक नहीं आया। अंत में एक व्यक्ति ने आकर घोड़ी का दाम पूछा तो उसने कहा 5 हजार रुपये की है। व्यक्ति बोला कि नहीं 5 हजार तक तो नहीं मैं 3 हजार देने को तैयार हूं। घोड़ी वाला चोर बोला कि 5 हजार से कम नहीं लेगा। व्यक्ति बोला कि में देखना चाहता हूं कि इसमें 5 हजार वाली क्या चीज है? घोड़ी को परखने के लिए वह घोड़ी पर चढ़ा। बोलाµचाल तो अच्छी नहीं है। घोड़ी को जब उसने ऐड़ लगायी तो दौड़ी। चोर रात भर इंतजार करता रहा लेकिन घोड़ी और वह व्यक्ति वापस नहीं आये। गांव गया, लोगों ने पूछा कितने की बेची। बोला जितने में खरीदी उतने में बेच दी। चोरी का माल चोरी हो गया। जो जैसा करेगा वैसा भरेगा उसका किया उसके सामने आयेगा।

हर व्यक्ति को अपने हिस्से का दुःख तो सहना ही पड़ेगा। मनुष्य दुःख से बचने के लिए अनेक प्रकार की वस्तुओं जैसे धागा, तावीज इत्यादि बांधते हैं। लेकिन क्यों? ऐसा करने से क्या तुम्हारे हिस्से का दुःख दूर होगा? कभी नहीं। सुख-दुःख में अपने मन को एक रंग में रंगना सीखो।

परमात्मा से प्रार्थना करनी चाहिए कि मुझे इतनी शक्ति दो कि मैं दुःख झेल सकूं, उनका खुशी से सामना करूं। सुख और दुःख क्या है? जहां तक, जिस सीमा तक तुम सहन कर सकते हो वहां सुख है। जहां सहन करने की ताकत खत्म हो जाए वहां दुःख है।

हममें जितना आत्मिक बल होगा हम उतना ही सुख भोगेंगे। परमात्मा की भक्ति से आत्मिक बल मिलता है। पहाड़ जैसा दुःख भी तिनके की भांति हल्का लगेगा और जिनके पास आत्मिक बल नहीं है उसके लिए तिनका भर दुःख भी पहाड़ के समान है। व्यक्ति को चाहिए कि वह अपने समय को व्यर्थ न जाने दे। खाली समय का भी ऐसा उपयोग होना चाहिए कि उसमें भी कोई पुण्य कार्य कर लें। अच्छे व्यक्ति खाली समय संगीत, साधना या मनोरंजन में बिता देते हैं। बुरे व्यक्ति खाली समय में विवाद करते हैं, तान कर सोते हैं या फिर बुरी लत में पड़ जाते हैं।

18 साल में माता-पिता, गुरु अपने बच्चों को राम नहीं बना सकते जितना कि जवानी के 18 दिन की बुरी संगति उसे रावण बना सकती है। इसीलिए कर्म के साथ जुड़ें, मन को खाली न रखें।

परमात्मा की भक्ति पर चलना है तो अपने चरित्र को कोमल बनाओ। दूसरों की तरक्की से खुश हो। हमें द्वेष भाव नहीं रखना है। मन को कोमल बनाना है। बनावटी जीवन जियोगे तो अशांति आयेगी, जितना खुश, सरल रहोगे उतना उत्साह बढ़ेगा।

जीवन के सत्य में ही छुपा है हंसी खुशी का राज


हमारे देश की सभ्यता, संस्कृति, रीति-रिवाज और परम्पराओं का अपना अलग ही महत्व है। हर रीति-रिवाज और परम्परा के पीछे आध्यात्मिक व वैज्ञानिक रहस्य तथा जन कल्याण की भावना सन्निहित है। अपनी अनुपम अद्वितीय सभ्यता, संस्कृति और परम्पराओं के बल पर ही भारत विश्वगुरु के सम्मानित और सर्वश्रेष्ठ उपाधि से विभूषित रहा।

एक बार विदेश में एक व्यक्ति मुझसे पूछने लगे, आपके देश की परम्पराएं समझ में नहीं आतीं, विचित्र परम्पराएं लगती हैं और ऐसी परम्पराएं हैं कि जिनका कोई तुक नहीं है। मैंने कहा कि अगर हिन्दुस्तान की परम्पराओं पर ध्यान दो तो हर परम्परा के पीछे बड़ा रहस्य छिपा है कि जिसका कोई मुकाबला नहीं किया जा सकता ।

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मैंने उन्हें बताया कि भारतीय परम्पराओं की तह पर जाओ, गहराई से समझो तब पता चलेगा कि क्या रहस्य है, कितना बड़ा संदेश छिपा है जैसे यह भी हमारे देश की परम्परा है कि जब कोई व्यक्ति दुनिया से विदा लेकर जाता है तो कैसी विचित्र परम्परा रखी गई है कि अर्थी लेकर जब लोग चलते हैं तो अर्थी आगे-आगे चलती है, लोग अर्थी के पीछे-पीछे चलते हैं और जब किसी का विवाह होता है, ब्याह-शादी का अवसर होता है, दूल्हा हमेशा ही पीछे-पीछे चला करता है और अन्य लोग आगे-आगे चला करते हैं, देखो यह विचित्र परम्परा है न!इतना सुनकर वह विदेशी सज्जन बोले, इसका मतलब? मैंने कहा मतलब सीधा साफ है जब अर्थी लेकर चलते हैं लोग पीछे-पीछे चल रहे होते हैं तो अर्थी की तरफ से यह संदेश दिया जाता है कि ऐ पीछे आने वाले इंसान। तू यह मत समझना कि तू इस दुनिया में सदा रहने के लिए आया है, जाना तो तुझे भी पड़ेगा एक न एक दिन। आज मैं आगे हूं तुम पीछे हो, कल तुम्हीं में से कोई न कोई आगे होगा और तुम्हीं में से कोई पीछे-पीछे छोड़ने के लिए आ रहा होगा। यह नितांंत सच है कि जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु भी निश्चित है और जैसे आज मैं कंधेे पर सवार होकर श्मशान भूमि की ओर जा रहा हूं, वैसा ही हाल तुम सब मेरे पीछे-पीछे आने वालों का होगा। किसी ने कहा है-हम भी गुस्ताखी करेंगे जिंदगी में एक बार।दोस्त सब पैदल चलेंगे और हम कंधों पर सवार।।न जाने कौन किसको छोड़ने के लिए जाएगा? किसके कंधों पर कौन होगा? लेकिन छोड़ना तो पड़ेगा संसार को अर्थी आगे-आगे चल रही है और अर्थी की तरफ से संदेश दिया जा रहा है, सभी पीछे चलने वाले बड़े ही शांत और गंभीर मुद्रा में बोलते जा रहे हैं- राम नाम सत्य है, हरि का नाम सत्य हैं। सत्य का मतलब है-सत्तावान और नित्य सदा रहने वाली वस्तु, इस संसार में तो हर वस्तु बदलने वाली है, सम्बन्धी भी सदा रहने वाले नहीं हैं। सब यहीं मिलेंगे और सब यहीं बिछुड़ेंगे, जो जीवन में कमाया है सब यहीं छूट जाएगा। इस संसार में कुछ सत्य है तो केवल भगवान का नाम ही है, बाकी सब मिथ्या है। इस बात को याद कराने के लिए एक व्यक्ति आगे-आगे बोलता जाता है और इसको फिर दूसरे लोग भी दोहराते जाते हैं। लेकिन अजीब बात तो यह है कि यह सभी जानते हैं -‘‘भगवान का नाम सत्य है।’’ ज्ञानी, ध्यानी और भगवान के भक्त लोग मंच पर बैठकर यह कहते भी है। श्मशान की ओर जा रही अर्थी यह संदेश देती है कि ओ धरती में रहने वाले इंसान! ये सारी दुनिया आज छूट गयी, धन छूट गया, वैभव छूट गया कोठी, बंगला, कार, घर-बार सब छूट गया। साथ जा रहा है तो केवल भगवान का नाम साथ जा रहा है। पीछे आने वाले इंसान तू भी याद रखना कि चिता तो एक दिन तेरी भी जलेगी, पता नहीं कब वो घड़ी आ जाए पर जो सत्य नाम है वो भगवान का नाम है, उसका सहारा जरूर लेना। तो बहुत बड़ी शिक्षा को देने के लिए यह परम्परा रखी गई है, अर्थी आगे चलती है लोग पीछे-पीछे चलते हैं। लेकिन जिस समय कोई व्यक्ति ब्याह-शादी करने के लिए विवाह के अवसर पर घोड़ी पर सवार होकर चलता है तो घोड़ी पर सवार दूल्हा सबसे पीछे रहता है और बारात के सभी लोग आगे-आगे चलते हैं। बारात जब चल रही होती है तो सबसे आगे बैंड-बाजा बज रहा होता है। अब उन कई तरह के साजों में एक विचित्र बात है जो दूल्हे को समझाई जाती है, बुजुर्ग लोग समझा रहे होते हैं कि देख बेटा! इन वाद्य यंत्रों में बज रहे संगीत को सुन और समझ। यह तेरे आगे-आगे बैण्ड बाजा है, उसके पीछे बच्चे नाचते हैं, उसके पीछे पगड़ियां बांधे हुए बुजुर्ग चल रहे हैं, सबसे पीछे तू दूल्हा बनकर चल रहा है तो बुजुर्गों की तरफ संदेश दिया जा रहा है, बताया जा रहा है कि तुम्हारी घर तुम्हारी गृहस्थी भी ऐसी ही होगी जैसे इस बैण्ड-बाजे में तरह-तरह के साज हैं, उसी तरह। इन साजों में कोई ऊंची आवाज वाला, कोई नीची आवाज वाला, कोई मीठी आवाज वाला, कोई तीखी आवाज वाला। इसी तरह से तेरे घर में भी कोई एक आवाज वाले लोग नहीं होंगे। होंगे तो अलग-अलग तरह आवाज वाले लोग होंगे, लेकिन जैसे इन बैंण्ड बाजे में सारे एक मीठी आवाज में एक होकर गा रहे हैं, मिलकर बोल रहे हैं तो संगीत पैदा हो गया है, ऐसे ही तू भी अपने घर में एकता रखना, तेरा घर में सुख-शान्ति आएगी और प्रसन्नता सदा नाचती रहेगी। इस बारात में एक और संदेश है कि इन बुजुर्गों को आगे रखकर चलना और खुद उनके पीछे चलना। बुजुर्गों को आगे रखने का मतलब है यह है कि तेरी सूझ-बूझ बहुत बड़ी है। इसलिए बेटा सच को जानना, स्वीकार करना और उसे मानना भी क्योंकि बुजुर्गों के पास जीवन का लम्बा अनुभव होता है, तजुर्बों की किताब होते हैं वे। जीवन में दुख भी, सुख, हानि-लाभ, जय-पराजय, मान-अपमान, दिन और रात की तरह बदलते रहेंगे सभी चक्रवत आएंगे, पर कभी इनसे विचलित नहीं होना और विवाह के समय बज रहे अलग-अलग वाद्य-यंत्रों में भी जैसे समरसता और माधुर्य का संगीत सुनाई देता है वैसे ही अपनी घर गृहस्थी के सुर को साधना और जीवन के सत्य परमपिता परमात्मा से हर समय अन्तरआत्मा से जुड़े रहना, यही हंसी-खुशी का राज है और जीवन का सत्य भी।

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